Saturday, 23 May 2020

Man and Nature- Poem

वर्तमान परिदृश्य में प्रकृति के समक्ष मनुष्य की हालत को देखते हुए एक उद्गार-
शीर्षक- प्रकृति और मानव
मानव! बुद्धि में अपार,
ईश्वर की अनुपम सृजन,
सृजनता से परिपूर्ण।
चौरासी लाख जीवों में श्रेष्ठ,
रचा था ईश्वर ने
तय कर कोई लक्ष्य,
बना विज्ञान का सहायक
धरा के विकास हेतु ,
बना सीढ़ी आस्माँ पर
बना डालने इक नई दुनिया।
गर कोई नजर डाले
इस धरा की ओर,
मोड़ दे उसका रास्ता
अनंत अन्तरिक्ष की ओर।
खोज डाले कोई नई धरती
इसी ब्रह्मांड में,
कि दूर हो एकाकीपन
मेरे इस धरा की।
पर तुने क्या किया?
बढाता रहा अपनी संख्या,
लुप्त कर असंख्य प्रजातियां
बेजुबान निरीह।
तोड़ प्रकृति चक्र
विज्ञान को भोग कर,
नष्ट-भ्रष्ट कर धरा आवरण
बनाया आशियाना,
झुलस रहा अंग-अंग,
व्याकुल हो रहा तन-मन,
उबल रहा धरा मन,
सुन -सुन करुण क्रन्दन।
बनाया तुझे प्रतिनिधि
नेक कार्य करने को,
पर तू मालिक बन
नियंता बना फिरा।
बम तुने बना लिया
करने स्वयं को निर्भय,
तोड़ वसुंधरा के
कण-कण अंग प्रत्यंग।
कर रहा है भूल तू,
कि कदम कहां टिके तेरे,
कि हर प्रहार तेरा,
तुम्ही पर आ आ गिरा।
सिर पर जो हाथ है,
लूँ अगर जो मैं उठा,
हाल हो तेरा भी,
ठीक डायनासोर सा।
कि वक्त है सम्हल जरा,
लालचोँ को रोककर,
जरा-जरा ठहरकर,
सोंचकर-विचारकर,
पुन: पीछे देखकर,
गलतियों से सबक ले,
सभी जीव-संतति,
सब को समान भार दे,
फिर अपना विकास कर।
फिर अपना विकास कर।।
सादर !
विकास प्रसाद।

1 comment:

  1. वर्तमान परिदृश्य में प्रकृति के समक्ष मनुष्य की हालत को देखते हुए एक उद्गार-

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