कोरोना लॉक डाऊन ने सड़कों को सुना- सुना कर के छोड़ा है। इस संबंद्ध में एक उद्गार-
शीर्षक- "निर्जन सड़कें"
निर्जन सड़कें
बयां कर रहीं हैं,
निरर्थकता
भागदौड़ की।
बयां कर रहीं हैं,
निरर्थकता
भागदौड़ की।
चढ़ आई हैं
लताएँ
चौड़ी सपाट
सड़कों पर,
थी अब तक सिमटी हुईं
धरा की शोरगुल से।
लताएँ
चौड़ी सपाट
सड़कों पर,
थी अब तक सिमटी हुईं
धरा की शोरगुल से।
उड़ रही हैं
रुई और फाहें सेमल की,
खुली पाकर सड़कें,
अबतक चिपट जाती थीं
निरंकुश पहियों से।
रुई और फाहें सेमल की,
खुली पाकर सड़कें,
अबतक चिपट जाती थीं
निरंकुश पहियों से।
परिंदे भी चहक रहे हैं,
कि दायरे उनके भी
वापिस मिले हैं,
जो घेर रखा था हमने।
कि दायरे उनके भी
वापिस मिले हैं,
जो घेर रखा था हमने।
चहक उठी हैं पगडंडियाँ,
कि पथिक गुनगुना रहे हैं कोकिल संग,
लौट कर परदेश से।
कि पथिक गुनगुना रहे हैं कोकिल संग,
लौट कर परदेश से।
आ जुटा है कुनबा
एक ही छत के नीचे
कि अब है सुकूं से।
एक ही छत के नीचे
कि अब है सुकूं से।
महक उठेगीं घर आंगन
की ग्रीष्म के बाद,
आने वाला है सावन।
की ग्रीष्म के बाद,
आने वाला है सावन।
आबाद होगी मातृभूमि,
कि बेगाना हुआ है परदेश,
उगाएंगे गेंहूँ और गुलाब
अब अपने ही देश।
अब अपने ही देश।।
कि बेगाना हुआ है परदेश,
उगाएंगे गेंहूँ और गुलाब
अब अपने ही देश।
अब अपने ही देश।।
सादर!
विकास प्रासाद
विकास प्रासाद

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