Saturday, 23 May 2020

Decreasing of Humanity in Man- poem

बस यूँ ही.......................
शीर्षक- 'जी चाहता है पशु हो जाऊँ'
फैले थे पहले ही मानव में
अवगुण हजार,
लजा रही थी अमावस, हृदय तम से,
जननी धरा को दूषित कर,
नरक सा किया था जीवन,
भरा नहीं मन इससे भी
चला नष्ट करने समग्र जीवन,
जना त्रासदी 'कोरोना'
अपनो को कलवित करने,
अपनो पर ही जयी बनने।
उसपर स्वजनित 'तम'
जन से जन में पसर रही है,
मानव होने का अभिमान अब रित रही है,
अब जी चाहता है पशु हो जाऊँ।
घुमू निर्विकार,
होकर निर्भय
कि हन्ता अब
छिपे हुए हैं घरों में,
हैं शेष जो भी ओ डरे सहमे।
न हो चिंता सरदी-गरमी की,
बस छांव ढूंढ लूँ वर्षा में,
चादर हो अपना तन ही,
न भय हो मच्छरों का
ना कोलेरा न डेंगू ,
न संचय की चिंता,
न लुटने-लुटाने का संशय,
बस कहीं से उदर भर लूँ,
जी चाहता है पशु हो जाऊँ।
न बम न मशिनगन,
नख-शिख ही रक्षक हमारा,
ध्वनि ही हो सहायक मेरा,
न तोड़ना हो धरती का हृदय,
न छीनना हो भूमि तेरा,
जो कुछ मिल जाये
बस विचरता ही
गुजर जाऊँ,
जी चाहता है पशु हो जाऊँ।
जी चाहता है पशु हो जाऊँ।।
सादर !
विकास प्रसाद

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