शीर्षक -झरता पत्ता-एक संदेश
झरता पत्ता
छूपाए एक जीवन-दर्शन
वह त्याग की प्रतिमुर्ति
संघर्ष की महागाथा
शीर्ष का शुन्य होना
देता एक सबक
चला मंजिल को।
छूपाए एक जीवन-दर्शन
वह त्याग की प्रतिमुर्ति
संघर्ष की महागाथा
शीर्ष का शुन्य होना
देता एक सबक
चला मंजिल को।
पाया था उठान
नभ स्पर्श विहगों संग कर प्रतिस्पर्धा
झेल झंझावतो को अडिग
पूर्ण कर दायित्व, आसनमुक्त
कर चला मंजिल को।
नभ स्पर्श विहगों संग कर प्रतिस्पर्धा
झेल झंझावतो को अडिग
पूर्ण कर दायित्व, आसनमुक्त
कर चला मंजिल को।
सर झुका नहीं सका कोई
गुजर गये तूफ़ां कई
आज चला है
स्वयं एकमेव होने
विहस कर मंजिल को, देता संदेश
कर तू होम निज जीवन
मातृभूमि कर रही इंतजार
तज तृष्णा संयम धर
नव सृजन का वाहक बन
फिर उड़ चल संग-संग
समीर मलयान्चल के
सुदूर देश मंजिल को।
गुजर गये तूफ़ां कई
आज चला है
स्वयं एकमेव होने
विहस कर मंजिल को, देता संदेश
कर तू होम निज जीवन
मातृभूमि कर रही इंतजार
तज तृष्णा संयम धर
नव सृजन का वाहक बन
फिर उड़ चल संग-संग
समीर मलयान्चल के
सुदूर देश मंजिल को।
सादर।
विकास प्रसाद
प्रयागराज।
विकास प्रसाद
प्रयागराज।
it is a beautiful expression of nature. it stated that every natural thing is filled with a message.
ReplyDelete