शीर्षक - गुजरा जमाना
पीपल की ओ शीतल छाँव
कौओं की ओ काँव-काँव
बालपन की हाव-भाव
किसे याद है ?
आती बसंत की पहली बयार
आम्र मंजरियो का ओ स्वाद
कोयल की ओ मधुर स्वागत गान
किसे याद है ?
पूरे फागुन
महुआ के पेड़ से गलबहियाँ
अर्ध रात्रि की टप-टप छप-छप
किसे याद है ?
बारिश का मौसम
हरफों में सिमटी बिजली
तेल के दिये
इतवारी बाजार की ओ लंबी लाइन
और लीटर भर तेल
किसे याद है ?
भादों का महीना
फिसलन भरी तालाब की मेंड
किसे याद है ?
सनसनाती अंधेरी रातों में
झिंगुरों की आवाज
मचान पर भूतों की कहानियाँ
किसे याद है ?
बगिया का जामुन
नीम का दातुन
नदिया में आचमन
ओ चना-गुड का जलपान
किसे याद है ?
और याद है वह
स्कूल के पिछवाड़े का
खोडर वाली इमली में
छुपना नजर बचाकर,
खड़ी है अबतलक
इंतज़ार में
कि लौटेगा बचपन
धमा-चौकड़ी खट्टी-मीठी इमली के संग
कर गलबहियाँ साथ
जीने की राह तलाशेंगे ।
जीने की राह तलाशेंगे ।।
सादर।
विकास प्रसाद
प्रयागराज।








